Saturday, March 5, 2011

मैं किसकी औरत हूं

मैं किसकी औरत हूं
                                                  
मैं किसकी औरत हूं
कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पांव दबाती हूं
किसका दिया खाती हूं
किसकी मार सहती हूं ...
ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामनेवाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफ़र करती

उम्र होगी कोई सत्तर - पचहत्तर साल
आंखें धंस गयी थीं उसकी
चेहरे पर थे दुख के पठार
थीं अनेक फटकारों की खाइयां

सेचकर बहुत मैंने कहा उससे
'मैं किसी की औरत नहीं हूं
मैं अपनी औरत हूं
अपना खाती हूं
जब जी चाहता है तब खाती हूं
मैं किसी की मार नहीं सहती
और मेरा परमेश्वर कोई नहीं '

उसकी आंखों में भर आई एक असहज ख़ामोशी
आह ! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन !
संशय में पड़ गयी वह
समझते हुए सभी कुछ
मैंने उसकी आंखों को अपने अकेलेपन के गर्व से भरना चाहा
फिर हंसकर कहा ' मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है
मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा
लेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं -
हम सब जानते हैं अब
कि कोई किसी का नहीं होता
सब अपने होते हैं
अपने आप में लथपथ
अपने होने के हक़ से लक़दक़'

यात्र लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है
अभी पार करनी हैं कई और खाइयां फटकारों की
दुख के एक दो और समुद्र
पठार यातनाओं के अभी और दो चार
जब आख़ि आएगी वह औरत
जिसे देख तुम और भी विस्मित होओगी
भयभीत भी शायद
रोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकित
कैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुम
लेकिन वह हंसेगा मेरी ही तरह
फिर कहेगी-
'उन्मुक्त हूं देखो ,
और यह आसमान
समुद्र यह और उसकी लहरें
हवा यह
और इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैं
और मैं हूं अपने पूर्वजों के  शाप और अभिलाषाओं से दूर
पूर्णतया अपनी'
                                                       -- सविता सिंह

ऐसा खत में लिखो !


महिला संगठनों का , लावणी की धुन में गाया , एक बेहद प्रि गीत है जो आवाज़-ए-निस्वां की कार्यकर्ता हनाज  शे और गीता महाजन ने लिखा है जिसमें मर्द रोजगार के लिए दुबई गया है , उसकी बीवी मुंबई में है और आवाज़-ए- निस्वां संगठन में महिलाओं की मदद करने जाती है पर कुछ लोगों ने उसकी शिकायत कर दी है इसलिए वह हर काम के लिए अपने पति की इजाज़त चाहती है और किसी दूसरे से उसके नाम खत लिखवा रही है कि उसकी बहन का शौहर उसे पीटता है , वह उसकी मदद करे या नहीं , धर्म और मजहब के नाम पर खून खराबा हो रहा है , सबको आपस में भाईचारे और अमन से रहना है , यह अपनी बस्ती में समझाए या नहीं | हैदराबादी हिंदी में लिखे इस पूरे गीत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह गीत के आखिर में अपने पति को भी औरतों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए साथ देने को कहती है - तू भी आजा साथ देने को ! इस गीत में एक औरत की मासूमियत दिखाई देती है , संगठन के कामों के प्रति उसमें लगन है और मन में इंसानियत का जज्बा है , तभी तो वह इतनी सहजता से सांप्रदायिकता के खिलाफ , धर्म के नाम पर होने वाले दंगों के खिलाफ हर दिल के भीतर जगह बना लेने वाला ऐसा संदेश दे पाती है -

पति के नाम एक संदे - ऐसा खत  में लिखो !

ऐसा त में लिखो!
मै अच्छी हूं , घबराओ नको, ऐसा खत में लिखो।

कोणी मेल्याने तुझको लिक्खा , मै निकली रोडां पर
अगर तुझ को क है मुझपर , नहीं निकलूंगी बाहर
पानी लेने को जाऊं क्या नको , ऐसा खत में लिखो.

सौ रुपये का हिसाब मांगा , तो मैने क्या घर में उड़ाई
लाईट के बीस दी , पानी के तीस दी , पचीस का राशन लायी
पचीस दूधवाले को दूं क्या नको , ऐसा खत में लिखो।

बाबा को आया बुखार खांसी, प्रायव्हेट में गयी उसको लेकर
सौ रूपया दिया , इंजेक्शन लिया, असर नही हुआ बच्चे पर
मै जे.जे. को जाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।

आवाजे-निस्वां है महिला मंडल, जाती मै उस मीटिंग को
तेरी बहन को शौहर जब पीटता , हम जाती धमकाने को
उस की मदद करूं क्या नको , ऐसा खत में लिखो।

बेबी को मैने स्कूल में भेजा , खूब अच्छी पढती है
औरतो को भी है लिखना-पढना , आवाजे निस्वां का मत है
मै पढने को जाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।

जबसे गया तू , बिगडा है माहौल, फसाद का डर है मुझको
मजहब के नाम पे कैसे ये झगड़े, अमन से रहना है सब को
ये बस्ती में समझाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।

महंगाई इतनी , रोजगार भी नहीं , तेरे जैसे जाते दुबई को
घर भी कितने टूट जाते देखो , दुख होता मेरे मन को
तू भी आता क्या साथ देने को , ऐसा खत में लिखो।

कोणी मेल्याने तुझको लिक्खा, मै ठुमकती रोडां पर
मीटिंग में जाती , मोर्चे पर जाती , हाथ में परचम ले
तू भी आ जा साथ देने को , ऐसा खत में लिखो । 

आवाज़-ए-निस्वां की कार्यकर्ता हनाज शेख और गीता महाजन द्वारा रचित गीत
मराठी अनुवाद
असं पत्रात लिवा -

तुम्ही खुशाल समदी हावा , असं पत्रात लिवा।।

कोण्या मेल्यानं तुम्हा कळविलं, मी ठुमकते रस्त्यावर
संय माझा आला तर , नाही जाणार मी बाहेर
पाणी आणाया जाउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।

शंभर रूपायचा हिषोब मागता , मी काय एकटीनं खाल्ले
लाईटचे वीस दिले, पाण्याचे तीस दिले, पंचवीसचे रान आणले
दूधवाल्याचे पन्नास देउ का नको , काय ते पत्रात लिवा।।

बाळाला आला ताप अन् खोकला, प्रायवेटला घेउन गेले,
त्याला जे. जे. ला नेउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।

बेबीला आताशा शाळेत घातलय, अभ्यास चांगला करते
आयाबायांनी शिकायला पायजे, वस्तीच अख्खी बोलते
मी बी शिकायला जाउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।

जवापासून तुमी गेला परदेषी, माजलेत इथे लफंगे
घडून मिळून राह्याच सोडून, धर्माच्या नावावर दंगे
समद्या वस्तीला समजावू का नको, काय ते पत्रात लिवा।।

नारी मुक्तीच्या मरतात सभा, मीटींगला आम्ही जातो
बहिणीला तुमच्या मारतो नवरा, सगळयाजणी धमकावतो,
तिला सोडवाया जाउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।

कोण्या मेल्यानं तुम्हा कळीवलं मी ठुमकते रस्त्यावर,
मीटींगला जाते, मोच्र्याला जाते, त्याविना कसं जमणार,
या तुमीबी साभ द्यायाला, असं पत्रात लिवा।।

अनुवाद - नारायण सुर्वे