महिला संगठनों का , लावणी की धुन में गाया , एक बेहद प्रिय गीत है जो आवाज़-ए-निस्वां की कार्यकर्ता शहनाज शेख और गीता महाजन ने लिखा है जिसमें मर्द रोजगार के लिए दुबई गया है , उसकी बीवी मुंबई में है और आवाज़-ए- निस्वां संगठन में महिलाओं की मदद करने जाती है पर कुछ लोगों ने उसकी शिकायत कर दी है इसलिए वह हर काम के लिए अपने पति की इजाज़त चाहती है और किसी दूसरे से उसके नाम खत लिखवा रही है कि उसकी बहन का शौहर उसे पीटता है , वह उसकी मदद करे या नहीं , धर्म और मजहब के नाम पर खून खराबा हो रहा है , सबको आपस में भाईचारे और अमन से रहना है , यह अपनी बस्ती में समझाए या नहीं | हैदराबादी हिंदी में लिखे इस पूरे गीत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह गीत के आखिर में अपने पति को भी औरतों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए साथ देने को कहती है - तू भी आजा साथ देने को ! इस गीत में एक औरत की मासूमियत दिखाई देती है , संगठन के कामों के प्रति उसमें लगन है और मन में इंसानियत का जज्बा है , तभी तो वह इतनी सहजता से सांप्रदायिकता के खिलाफ , धर्म के नाम पर होने वाले दंगों के खिलाफ हर दिल के भीतर जगह बना लेने वाला ऐसा संदेश दे पाती है -
पति के नाम एक संदेश - ऐसा खत में लिखो !
ऐसा ख़त में लिखो!
मै अच्छी हूं , घबराओ नको, ऐसा खत में लिखो।

कोणी मेल्याने तुझको लिक्खा , मै निकली रोडां पर
अगर तुझ को शक है मुझपर , नहीं निकलूंगी बाहर
पानी लेने को जाऊं क्या नको , ऐसा खत में लिखो.
सौ रुपये का हिसाब मांगा , तो मैने क्या घर में उड़ाई
लाईट के बीस दी , पानी के तीस दी , पचीस का राशन लायी
पचीस दूधवाले को दूं क्या नको , ऐसा खत में लिखो।
बाबा को आया बुखार खांसी, प्रायव्हेट में गयी उसको लेकर
सौ रूपया दिया , इंजेक्शन लिया, असर नही हुआ बच्चे पर
मै जे.जे. को जाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।
आवाजे-निस्वां है महिला मंडल, जाती मै उस मीटिंग को
तेरी बहन को शौहर जब पीटता , हम जाती धमकाने को
उस की मदद करूं क्या नको , ऐसा खत में लिखो।
बेबी को मैने स्कूल में भेजा , खूब अच्छी पढती है
औरतो को भी है लिखना-पढना , आवाजे निस्वां का मत है
मै पढने को जाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।
जबसे गया तू , बिगडा है माहौल, फसाद का डर है मुझको
मजहब के नाम पे कैसे ये झगड़े, अमन से रहना है सब को
ये बस्ती में समझाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।
महंगाई इतनी , रोजगार भी नहीं , तेरे जैसे जाते दुबई को
घर भी कितने टूट जाते देखो , दुख होता मेरे मन को
तू भी आता क्या साथ देने को , ऐसा खत में लिखो।
कोणी मेल्याने तुझको लिक्खा, मै ठुमकती रोडां पर
मीटिंग में जाती , मोर्चे पर जाती , हाथ में परचम लेकर
तू भी आ जा साथ देने को , ऐसा खत में लिखो ।
आवाज़-ए-निस्वां की कार्यकर्ता शहनाज शेख और गीता महाजन द्वारा रचित गीत
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मराठी अनुवाद
असं पत्रात लिवा -
तुम्ही खुशाल समदी हावा , असं पत्रात लिवा।।
कोण्या मेल्यानं तुम्हा कळविलं, मी ठुमकते रस्त्यावर
संशय माझा आला तर , नाही जाणार मी बाहेर
पाणी आणाया जाउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।
शंभर रूपायचा हिषोब मागता , मी काय एकटीनं खाल्ले
लाईटचे वीस दिले, पाण्याचे तीस दिले, पंचवीसचे राशन आणले
दूधवाल्याचे पन्नास देउ का नको , काय ते पत्रात लिवा।।
बाळाला आला ताप अन् खोकला, प्रायवेटला घेउन गेले,
त्याला जे. जे. ला नेउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।
बेबीला आताशा शाळेत घातलय, अभ्यास चांगला करते
आयाबायांनी शिकायला पायजे, वस्तीच अख्खी बोलते
मी बी शिकायला जाउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।
जवापासून तुमी गेला परदेषी, माजलेत इथे लफंगे
घडून मिळून राह्याच सोडून, धर्माच्या नावावर दंगे
समद्या वस्तीला समजावू का नको, काय ते पत्रात लिवा।।
नारी मुक्तीच्या मरतात सभा, मीटींगला आम्ही जातो
बहिणीला तुमच्या मारतो नवरा, सगळयाजणी धमकावतो,
तिला सोडवाया जाउ का नको, काय ते पत्रात लिवा।।
कोण्या मेल्यानं तुम्हा कळीवलं मी ठुमकते रस्त्यावर,
मीटींगला जाते, मोच्र्याला जाते, त्याविना कसं जमणार,
या तुमीबी साभ द्यायाला, असं पत्रात लिवा।।
अनुवाद - नारायण सुर्वे
1 comment:
geeta nahajan ne mujhe isaaki janakari di thi. baad mein Narain Ssurve ji ne bhi ise confirmkiya tha.hamre yaha ise sunaya bhi tha.
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