Saturday, March 5, 2011

महिला दिवस पर कविताऍ

नयी सदी की औरत
अब मैं वो पेड़ नहीं बन सकती
कि तुम पत्थर मारो
और मैं फल दूँ तुमको
मैं वो नाव नहीं बन सकती
कि तुम जिधर को खेओ
मैं खिचती चली जाऊँ
मैं वो फूल नहीं बन सकती
कि तुम पत्ती-पत्ती करके मसलो
और मैं बेशर्मी से महकती रहूँ
नहीं मैं वो काँटा भी नहीं हूँ
कि बिना तुम्हारे छेड़े
चुभ जाऊँ हाथों में
पर वो बादल भी नहीं हूँ
कि किसी को प्यासा देख इतना बरसूँ
कि खुद खाली हो जाऊँ
तुम्हें छाया चाहिए
फल चाहिए
तो मुझे भी खाद पानी देना होगा
तुम्हें पार लगाने का दायित्व मेरा सही
पर मुझे लहरों की दिशा में तो खेना होगा
मेरा रंग, गंध, स्पर्श तुम ले लो
पर मुझे डाली के साथ तो लगे रहने देना होगा
स्वीकार सको तो स्वीकारो
मुझे मेरे तमाम गुणों-अवगुणों
और तमाम शर्तों के साथ
वरना मैं खुश हूँ
सिर्फ मैं होने में ही.....
         -- अनुपम मोंगिया
बेटियां 
ओस की बूंदों सी होती हैं बेटियां  
ज़रा भी दर्द हो तो रोती हैं बेटियां .
रोशन करेगा बेटा एक ही कुल को ,
दो-दो कुलों की लाज ढोती हैं बेटियां .
हीरा अगर है बेटा
तो सच्ची मोती हैं बेटियां ,
काँटों की राह पर
यह खुद ही चलती रहेंगी
औरों के लिए फूल सी होती हैं बेटियां !
बोये जाते हैं बेटे और उग आती हैं बेटियां .
खाद- पानी बेटों में
और लहलहाती  हैं बेटियां .
ऊंचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे
और चढ़ जाती हैं बेटियां .
रुलाते हैं बेटे और रोती हैं बेटियां 
मुट्ठी भर नीर सी होती हैं बेटियां .
कई तरह से गिराते हैं बेटे ,
संभाल लेती हैं बेटियां !
विधि का विधान है ,
यही दुनिया की रस्म है ,                        
जीवन तो बेटों का है ,
और मारी जाती हैं बेटियां !!!
-    नन्द किशोर हटवाल

No comments: